नहीं रुका भ्रष्टाचार
जिस तरह की उम्मीद की जा रही थी कि देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा, भ्रष्टाचारियों को पकड़कर जेल में डाल दिया जायेगा और छुपाया गया कालाधन बाहर निकालकर ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा होगा जिससे कि आम आदमी को राहत मिल जायेगी। उलट इसके जो भ्रष्टाचार कर रहे थे वह अब भी मजे में हैं सरकार ने नोटबंदी के माध्यम से भले ही उनके कालेधन पर सेंध लगा ली हो लेकिन इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। सरकार ने चाहे कितने भी दावे किए हों लेकिन तमाम दावे खोखले दिखाई दे रहे हैं जिन्हें लाभ पहुंचाया जाना था उन्हें नए नए रास्तों से लाभ पहुंचाया जा चुका है यहां तक कि कई ऐसी योजनाएं लांच कर दी गई हैं जिससे कि बड़े लोगों को एक एक रुपया काम का हो जाए। जुर्माना और सजा की स्कीमें दिखावा हैँ क्योंकि नोटबंदी के बाद मोदी सरकार एक बार भी सार्वजनिक रूप से यह घोषणा नहीं कर सकी है कि उसके इस आर्थिक अटैक से कितने भ्रष्टाचारियों के नाम सामने आए, कितना कालाधन उजागर हुआ, कितनों के खिलाफ कार्रवाई की गई कितने जेल भेजे गए। आम जनता की तकलीफें जहां की तहां हैं बल्कि अब वह और परेशान हो रहा है हालात यह है कि वह अपने ही जमा पैसे को न निकाल पा रहा है और न ही खर्च। कैसलेश योजना भी उतनी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि इस व्यवस्था कि लिए जो बुनियादी तकनीकी जरूरतें हैं उन्हें पूरा करने में देश को काफी वक्त लगेगा। संदेह में कोई गुजाइश नहीं बची कि इस नोटबंदी की आड़ में कई उद्योगधंधों को कर्मचारियों की छंटनी कर दी। सरकार ने अपनी विफलता को छुपाने के लिए ऐसे तर्क दिए हैं जो अब गले नहीं उतर रहे हैं।
जिस तरह की उम्मीद की जा रही थी कि देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा, भ्रष्टाचारियों को पकड़कर जेल में डाल दिया जायेगा और छुपाया गया कालाधन बाहर निकालकर ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा होगा जिससे कि आम आदमी को राहत मिल जायेगी। उलट इसके जो भ्रष्टाचार कर रहे थे वह अब भी मजे में हैं सरकार ने नोटबंदी के माध्यम से भले ही उनके कालेधन पर सेंध लगा ली हो लेकिन इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। सरकार ने चाहे कितने भी दावे किए हों लेकिन तमाम दावे खोखले दिखाई दे रहे हैं जिन्हें लाभ पहुंचाया जाना था उन्हें नए नए रास्तों से लाभ पहुंचाया जा चुका है यहां तक कि कई ऐसी योजनाएं लांच कर दी गई हैं जिससे कि बड़े लोगों को एक एक रुपया काम का हो जाए। जुर्माना और सजा की स्कीमें दिखावा हैँ क्योंकि नोटबंदी के बाद मोदी सरकार एक बार भी सार्वजनिक रूप से यह घोषणा नहीं कर सकी है कि उसके इस आर्थिक अटैक से कितने भ्रष्टाचारियों के नाम सामने आए, कितना कालाधन उजागर हुआ, कितनों के खिलाफ कार्रवाई की गई कितने जेल भेजे गए। आम जनता की तकलीफें जहां की तहां हैं बल्कि अब वह और परेशान हो रहा है हालात यह है कि वह अपने ही जमा पैसे को न निकाल पा रहा है और न ही खर्च। कैसलेश योजना भी उतनी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि इस व्यवस्था कि लिए जो बुनियादी तकनीकी जरूरतें हैं उन्हें पूरा करने में देश को काफी वक्त लगेगा। संदेह में कोई गुजाइश नहीं बची कि इस नोटबंदी की आड़ में कई उद्योगधंधों को कर्मचारियों की छंटनी कर दी। सरकार ने अपनी विफलता को छुपाने के लिए ऐसे तर्क दिए हैं जो अब गले नहीं उतर रहे हैं।