Saturday, 4 February 2017

नहीं रुका भ्रष्टाचार

नहीं रुका भ्रष्टाचार 
जिस तरह की उम्मीद की जा रही थी कि देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा, भ्रष्टाचारियों को पकड़कर जेल में डाल दिया जायेगा और छुपाया गया कालाधन बाहर निकालकर ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा होगा जिससे कि आम आदमी को राहत मिल जायेगी। उलट इसके जो भ्रष्टाचार कर रहे थे वह अब भी मजे में हैं सरकार ने नोटबंदी के माध्यम से भले ही उनके कालेधन पर सेंध लगा ली हो लेकिन इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। सरकार ने चाहे कितने भी दावे किए हों लेकिन तमाम दावे खोखले दिखाई दे रहे हैं जिन्हें लाभ पहुंचाया जाना था उन्हें नए नए रास्तों से लाभ पहुंचाया जा चुका है यहां तक कि कई ऐसी योजनाएं लांच कर दी गई हैं जिससे कि बड़े लोगों को एक एक रुपया काम का हो जाए। जुर्माना और सजा की स्कीमें दिखावा हैँ क्योंकि नोटबंदी के बाद मोदी सरकार एक बार भी सार्वजनिक रूप से यह घोषणा नहीं कर सकी है कि उसके इस आर्थिक अटैक से कितने भ्रष्टाचारियों के नाम सामने आए, कितना कालाधन उजागर हुआ, कितनों के खिलाफ कार्रवाई की गई कितने जेल भेजे गए। आम जनता की तकलीफें जहां की तहां हैं बल्कि अब वह और परेशान हो रहा है हालात यह है कि वह अपने ही जमा पैसे को न निकाल पा रहा है और न ही खर्च। कैसलेश योजना भी उतनी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है क्योंकि इस व्यवस्था कि लिए जो बुनियादी तकनीकी जरूरतें हैं उन्हें पूरा करने में देश को काफी वक्त लगेगा। संदेह में कोई गुजाइश नहीं बची कि इस नोटबंदी की आड़ में कई उद्योगधंधों को कर्मचारियों की छंटनी कर दी। सरकार ने अपनी विफलता को छुपाने के लिए ऐसे तर्क दिए हैं जो अब गले नहीं उतर रहे हैं। 
नोटबंदी के जरिए करप्शन और काले धन के खिलाफ जारी सरकारी जंग में ट्रांसपैरंसी इंटरनैशनल का सालाना करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (2016) में हमारा देश पिछले साल के मुकाबले 76 वें स्थान से खिसक कर 79वें नंबर पर पहुंच गया है। ट्रांसपैरंसी इंटरनैशनल ने अपने विश्लेषण में ठीक ही कहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को लेकर नेताओं के बड़े-बड़े बयानों के बावजूद भारत इस मोर्चे पर कुछ खास प्रगति नहीं कर सका है। अन्ना आंदोलन के दौरान लोगों में भ्रष्टाचार का खात्मा करने की जो उम्मीदें दिख रही थीं, वे अब पूरी तरह जमींदोज हो चुकी हैं। उस समय जिन कुछेक कदमों पर राजनीतिक सर्वसम्मति बन गई थी, उनमें भरपूर पानी मिला दिया गया है, और इन पनियल उपायों पर भी अमल का कोई लक्षण नहीं दिख रहा। ट्रांसपैरंसी इंटरनेशनल ने ठीक ही कहा है कि नोटबंदी के दौरान भ्रष्टाचार के सवाल पर आम लोगों के भारी समर्थन के सबूत मिले, लेकिन यह भ्रष्टाचार पर कोई असर डाल सकी है या नहीं, इसका कोई अंदाजा नहीं मिल रहा। बेहतर होगा कि सरकार सुर्खियां बटोरने की मानसिकता से उबरे और छोटे-छोटे लेकिन लोगों की भागीदारी बढ़ाने वाले कदमों के जरिए करप्शन पर काबू पाने की कोशिश करे।

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